कबीर की भक्ति-विचारधारा को किस परंपरा में रखना सबसे उपयुक्त है?
व्याख्या
इस कठिन मध्यकालीन इतिहास प्रश्न का प्रमाण-आधारित उत्तर निर्गुण भक्ति है। कबीर की वाणी निराकार ईश्वर, आंतरिक भक्ति तथा खोखले कर्मकांड, सांप्रदायिक अहंकार और कठोर सामाजिक भेद की आलोचना करती है। भक्ति और सूफी परंपराएँ एकरूप आंदोलन नहीं थीं। गलत विकल्पों को भी अलग करना आवश्यक है: तांत्रिक बौद्ध धर्म भिन्न संस्था, संदर्भ या कालक्रम से जुड़ा है; मंदिर-केंद्रित शैव धर्म प्रश्न में बताए कार्य को पूरा नहीं करता; और सगुण राम-भक्ति अपेक्षित ऐतिहासिक संबंध से मेल नहीं खाता। “कबीर की भक्ति-विचारधारा को किस परंपरा में रखना सबसे उपयुक्त है?” की भाषा जानबूझकर विशिष्ट रखी गई है, इसलिए पहले उसके केंद्रीय संकेत को पहचानना चाहिए। पुनरावृत्ति में “कबीर की भक्ति-विचारधारा को किस परंपरा में रखना सबसे उपयुक्त है? — निर्गुण भक्ति” युग्म के साथ ऊपर दिया तथ्यात्मक कारण भी याद रखें। इससे SSC, State PSC, Railway और UPSC foundation की कथन-आधारित, कालक्रम तथा elimination पद्धति वाले प्रश्न हल करने में सहायता मिलेगी।