पूर्ण स्वराज प्रस्ताव के बाद 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया। यही स्वतंत्रता दिवस प्रतिज्ञा (1930) का वास्तविक महत्व है। स्वतंत्रता दिवस प्रतिज्ञा के बारे में: यह प्रतिज्ञा पूरे भारत में सार्वजनिक सभाओं में पढ़ी गई और वास्तविक स्वतंत्रता (अगस्त 1947) से वर्षों पहले, स्वतंत्रता दिवस का पहला संगठित, राष्ट्रव्यापी आयोजन बन गई। स्वतंत्रता दिवस प्रतिज्ञा भारत के राष्ट्रीय आंदोलन (1927-1947) के कालखंड का हिस्सा है, और परीक्षा में इसे प्रायः इसी समयरेखा की पड़ोसी घटनाओं के साथ जोड़कर पूछा जाता है। कथन "इसने बिना किसी वार्ता के तुरंत एक संप्रभु गणराज्य की स्थापना कर दी।" स्वतंत्रता दिवस प्रतिज्ञा के लिए गलत है क्योंकि यह वास्तविक परिणाम को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, जबकि सही परिणाम था: पूर्ण स्वराज प्रस्ताव के बाद 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया। कथन "यह केवल एक स्थानीय आर्थिक उपाय था जिसका कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं था।" स्वतंत्रता दिवस प्रतिज्ञा के लिए गलत है क्योंकि यह वास्तविक परिणाम को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, जबकि सही परिणाम था: पूर्ण स्वराज प्रस्ताव के बाद 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया। कथन "इसने सभी राष्ट्रवादी गतिविधियों को स्थायी रूप से समाप्त कर दिया।" स्वतंत्रता दिवस प्रतिज्ञा के लिए गलत है क्योंकि यह वास्तविक परिणाम को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, जबकि सही परिणाम था: पूर्ण स्वराज प्रस्ताव के बाद 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया। SSC CGL, SSC CHSL, राज्य PSC और रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में स्वतंत्रता दिवस प्रतिज्ञा (1930) से जुड़ा प्रश्न अक्सर पूछा जाता है, इसलिए वर्ष, प्रमुख व्यक्ति और परिणाम को एक साथ याद रखने से राष्ट्रीय आंदोलन की समयरेखा की अन्य घटनाओं से भ्रम नहीं होता।