इसमें कार्यकारी परिषद के विस्तार और युद्धोत्तर संवैधानिक चर्चा का वादा किया गया। यही अगस्त प्रस्ताव (1940) का वास्तविक महत्व है। अगस्त प्रस्ताव के बारे में: यह वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जारी किया गया था, और कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने इसे अपनी-अपनी राजनीतिक मांगों को पूरा न करने के कारण अस्वीकार कर दिया। अगस्त प्रस्ताव भारत के राष्ट्रीय आंदोलन (1927-1947) के कालखंड का हिस्सा है, और परीक्षा में इसे प्रायः इसी समयरेखा की पड़ोसी घटनाओं के साथ जोड़कर पूछा जाता है। कथन "इसने बिना किसी वार्ता के तुरंत एक संप्रभु गणराज्य की स्थापना कर दी।" अगस्त प्रस्ताव के लिए गलत है क्योंकि यह वास्तविक परिणाम को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, जबकि सही परिणाम था: इसमें कार्यकारी परिषद के विस्तार और युद्धोत्तर संवैधानिक चर्चा का वादा किया गया। कथन "यह केवल एक स्थानीय आर्थिक उपाय था जिसका कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं था।" अगस्त प्रस्ताव के लिए गलत है क्योंकि यह वास्तविक परिणाम को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, जबकि सही परिणाम था: इसमें कार्यकारी परिषद के विस्तार और युद्धोत्तर संवैधानिक चर्चा का वादा किया गया। कथन "इसने सभी राष्ट्रवादी गतिविधियों को स्थायी रूप से समाप्त कर दिया।" अगस्त प्रस्ताव के लिए गलत है क्योंकि यह वास्तविक परिणाम को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, जबकि सही परिणाम था: इसमें कार्यकारी परिषद के विस्तार और युद्धोत्तर संवैधानिक चर्चा का वादा किया गया। SSC CGL, SSC CHSL, राज्य PSC और रेलवे जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अगस्त प्रस्ताव (1940) से जुड़ा प्रश्न अक्सर पूछा जाता है, इसलिए वर्ष, प्रमुख व्यक्ति और परिणाम को एक साथ याद रखने से राष्ट्रीय आंदोलन की समयरेखा की अन्य घटनाओं से भ्रम नहीं होता।