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भारतीय इतिहास
easyQ. No. 15891

कौन-सा ग्रंथ कर्मफल से आसक्ति छोड़े हुए कर्म करने की प्रारंभिक उपनिषदिक शिक्षा देता है?

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यह प्रश्न “कौन-सा ग्रंथ कर्मफल से आसक्ति छोड़े हुए कर्म करने की प्रारंभिक उपनिषदिक शिक्षा देता है?” में निहित ऐतिहासिक संबंध पर केंद्रित है। इसमें ईश उपनिषद को संबंधित कालक्रम, संस्था, संरक्षण, ग्रंथ, क्षेत्र या प्रशासनिक कार्य से जोड़ना आवश्यक है।

Aईश उपनिषद
Bऋग्वेद संहिता
Cऐतरेय ब्राह्मण
Dजाबाल उपनिषद
Correct Answer: ईश उपनिषदYour Answer: A

Explanation

ईश उपनिषद बंधनकारी आसक्ति से बचते हुए कर्म करने को पूर्ण मानव जीवन से जोड़ता है। यह अनासक्त कर्म की बाद की अवधारणाओं का महत्त्वपूर्ण पूर्वरूप है। निष्काम कर्म का तकनीकी और विकसित प्रतिपादन विशेष रूप से भगवद्गीता से जुड़ा है, इसलिए “सबसे पहले प्रतिपादित” कहने में सावधानी चाहिए। प्रशासनिक शब्दों को उनके कार्य के आधार पर अलग करने से भ्रम दूर होता है। ईश उपनिषद इसलिए उपयुक्त है क्योंकि प्रश्न में दिया कालक्रम, कर्ता और कार्य इसी से मेल खाते हैं। विकल्पों की तुलना करने पर ऋग्वेद संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण और जाबाल उपनिषद वास्तविक ऐतिहासिक नाम या पद अवश्य हैं, किंतु उनका संबंध अलग शासक, संस्था, ग्रंथ, क्षेत्र या समय से है। अतः याद रखने योग्य संबंध केवल विकल्प का अक्षर नहीं, बल्कि ईश उपनिषद और ऊपर दिया तथ्यात्मक संदर्भ है।

महत्वपूर्ण नोट्स

  • ईश उपनिषद का संबंध प्रश्न में दिए विशिष्ट कर्ता, कालक्रम या कार्य से है।
  • मुख्य तथ्यात्मक संदर्भ है: ईश उपनिषद बंधनकारी आसक्ति से बचते हुए कर्म करने को पूर्ण मानव जीवन से जोड़ता है।
  • इसे ऋग्वेद संहिता से न मिलाएँ, जिसका ऐतिहासिक संबंध अलग है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण और जाबाल उपनिषद को काल तथा संस्थागत भूमिका के आधार पर जाँचें।

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