ईश उपनिषद बंधनकारी आसक्ति से बचते हुए कर्म करने को पूर्ण मानव जीवन से जोड़ता है। यह अनासक्त कर्म की बाद की अवधारणाओं का महत्त्वपूर्ण पूर्वरूप है। निष्काम कर्म का तकनीकी और विकसित प्रतिपादन विशेष रूप से भगवद्गीता से जुड़ा है, इसलिए “सबसे पहले प्रतिपादित” कहने में सावधानी चाहिए। प्रशासनिक शब्दों को उनके कार्य के आधार पर अलग करने से भ्रम दूर होता है। ईश उपनिषद इसलिए उपयुक्त है क्योंकि प्रश्न में दिया कालक्रम, कर्ता और कार्य इसी से मेल खाते हैं। विकल्पों की तुलना करने पर ऋग्वेद संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण और जाबाल उपनिषद वास्तविक ऐतिहासिक नाम या पद अवश्य हैं, किंतु उनका संबंध अलग शासक, संस्था, ग्रंथ, क्षेत्र या समय से है। अतः याद रखने योग्य संबंध केवल विकल्प का अक्षर नहीं, बल्कि ईश उपनिषद और ऊपर दिया तथ्यात्मक संदर्भ है।