व्याख्या
प्रारंभिक वैदिक सामग्री में जौ प्रमुख है, जबकि उत्तर वैदिक ग्रंथों में धान और व्यापक कृषि शब्दावली अधिक स्पष्ट होती है। धान, जौ और गेहूँ तीनों को केवल यजुर्वेद में विशिष्ट रूप से “वर्णित” कहना अलग-अलग वैदिक ग्रंथों और शाखाओं में फैले शब्दों को अत्यधिक सरल बनाता है। स्रोत-परंपरा व्यक्ति, रचना और घटना को निश्चित ऐतिहासिक संदर्भ में रखती है। जौ और अन्य अनाजों के साथ धान के अधिक उल्लेख इसलिए उपयुक्त है क्योंकि प्रश्न में दिया कालक्रम, कर्ता और कार्य इसी से मेल खाते हैं। विकल्पों की तुलना करने पर जौ का पूर्ण लोप, केवल आयातित गेहूँ पर निर्भरता और कृषि शब्दावली का अभाव वास्तविक ऐतिहासिक नाम या पद अवश्य हैं, किंतु उनका संबंध अलग शासक, संस्था, ग्रंथ, क्षेत्र या समय से है। सामान्य भूल यह होती है कि विद्यार्थी प्रश्न में पूछी गई भूमिका जाँचे बिना सबसे परिचित नाम चुन लेता है। व्यक्ति, काल, स्थान और संस्थागत उद्देश्य को एक साथ देखने पर यह भ्रम दूर होता है। दिया गया स्रोत प्रचलित संक्षिप्त कथन और अधिक सटीक ऐतिहासिक व्याख्या के बीच अंतर भी स्पष्ट करता है। कथन-आधारित रूप में प्रत्येक कथन को अलग जाँचना चाहिए, क्योंकि सही नाम गलत तिथि या गलत कार्य की भरपाई नहीं कर सकता। कालक्रम वाले रूप में पहले घटना को संबंधित वंश के भीतर रखें और उसके बाद विकल्प हटाएँ। अतः याद रखने योग्य संबंध केवल विकल्प का अक्षर नहीं, बल्कि जौ और अन्य अनाजों के साथ धान के अधिक उल्लेख और ऊपर दिया तथ्यात्मक संदर्भ है।